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कल संन्यास, आज संकेत वापसी के! संदीप जोशी पर ‘बोलते कुछ, करते कुछ’ के आरोप

 संदीप जोशी के बदले सुर पर उठे सवाल, सोशल मीडिया पर ‘पलटूराम’ कहकर ट्रोल


नागपुर | विशेष संवाददाता

“कार्यकर्ताओं का प्रेम है, वे उसे व्यक्त कर रहे हैं, इतना ही मैं कह सकता हूँ”—यह बयान भाजपा के वरिष्ठ नेता संदीप जोशी ने आज दिया।

हालाँकि, उनके इस बदले हुए रुख ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है।

दरअसल, महज़ एक दिन पहले ही संदीप जोशी ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि उन्होंने राजनीतिक संन्यास लेने का फैसला कर लिया है और विधान परिषद की अवधि समाप्त होने के बाद, भले ही उन्हें दोबारा अवसर मिले, वे उसे स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और अब नए लोगों को मौका मिलना चाहिए।

लेकिन आज दिए गए बयान ने उनकी कल की ‘प्रगल्भ और ठोस’ मानी जा रही भूमिका पर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं।



सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं

संदीप जोशी के आज के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। कई यूज़र्स ने उनके बदले रुख को लेकर उन्हें ‘पलटूराम’ तक कह दिया।

कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं—

“बोलते कुछ हैं, करते कुछ और।”

“फैसला लिया है तो उस पर कायम क्यों नहीं रहते?”

“लगता है फिर से विधान परिषद की उम्मीद नहीं दिख रही, इसलिए बयान बदल गया।”

“कल गंभीरता थी, आज राजनीतिक नौटंकी लग रही है।”

“संन्यास लेना था तो ड्रामा क्यों किया?”

कुछ यूज़र्स ने तो व्यंग्य करते हुए बेहद तीखे शब्दों का भी इस्तेमाल किया। एक यूज़र ने लिखा—

“नको नको कहते हुए हाथ आगे बढ़ाना, यही असली राजनीति है।”

पुराने राजनीतिक रिकॉर्ड पर भी तंज

एक नेटकरी ने तंज कसते हुए लिखा कि—

“चार दशकों से जिस पदवीधर मतदारसंघ की सीट भाजपा कभी नहीं हारी थी, वह हार संदीप जोशी के दौर में हुई।”

वहीं एक अन्य ने आशंका जताई कि—

“यह संन्यास नहीं, बल्कि अपनी बार्गेनिंग पावर जांचने की कोशिश है। कल कहा जाएगा कि देवेंद्रजी से चर्चा हो गई, अब फैसला वापस ले लिया।”

यहाँ ‘देवेंद्रजी’ से इशारा राज्य के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर माना जा रहा है।

प्रतिष्ठा बनाम कुर्सी की बहस

कल तक ‘कुर्सी नहीं, क़ीमत बचाने’ की बात करने वाले संदीप जोशी पर आज कई यूज़र्स ने अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा से समझौता करने का आरोप लगाया है।

अब सवाल यह उठ रहा है कि—

👉 कल की भूमिका उनकी असली सोच थी या आज का बयान ही उनका वास्तविक राजनीतिक इरादा है?

इस राजनीतिक उलझन में फिलहाल जवाबों से ज़्यादा सवाल हैं। सच क्या है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

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